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इस नश्वर संसार में भावुकता हर रिश्ते के लिए ठीक नहीं

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गौरी शर्मा

इस नश्वर संसार में कदम रखते ही बहुत सारे रिश्ते स्वतः ही इंसान के साथ जुड़ जाते हैं। कर्तव्य और अधिकार उस रिश्ते के जरूरी तत्व होते हैं। ह्रदयतल पर अंकित ऐसे रिश्तों में संवेदनाओं की बहुत बड़ी भूमिका होती है। जिससे रिश्ते प्रगाढ़ होते हैं। पर भावना के अतिरेक में कभी कभी भावुकता दूसरों के समक्ष आपको कमजोर भी साबित कर सकती है। इसलिए उन स्थितियों से बचना चाहिए, आपकी आंतरिक शक्ति भी यही कहती है।

हर इंसान का अपना ओहरा होता है जो कि उसके व्यक्तित्व को किसी के मानस में जगह प्रदान करता है। किंतु देखा यह जाता है कि भावुकता में इंसान अपने उस वजूद को खो देता है। जबकि आज की दुनिया के हिसाब से उसे प्रायोगिक होना चाहिए। हर रिश्ता सिर्फ उसी आधार पर चलता है। आँख के जल को गंगाजल समझकर कितने लोग उसका आचमन करते हैं ये विचारणीय तथ्य है। आपके मानस पटल पर अंकित ज्यादातर रिश्ते भावुकता के शिकार होकर दम तोड़ते हैं। इनको हमेशा ऐसी भावुकता से दूर रखना चाहिए।

मेरा अपना मानना ये है कि ऐसे में व्यक्ति को अध्यात्म से इसलिए भी जुड़ा रहना चाहिए क्योंकि वो जहाँ आपको एकांतवास में भी अकेलेपन का एहसास नहीं होने देता वहीं दूसरी तरफ जीने का हौसला भी देता है। कभी कभी अतिरिक्त भावुकता इंसान को दूसरे की नज़र में काफी कमजोर भी साबित करती है, तो उसके लिए व्यक्ति को अंदर से बेहद मजबूत होना चाहिए। मजबूती का यह मतलब भी कदापि नहीं है कि व्यक्ति संवेदनहीन हो जाये। करुणा, दया और संवेदना का हर इंसान के व्यक्तित्व में समाहित होना जरूरी है। बस भावुकता का अतिरेक प्रवाह कमजोरी का परिचायक नहीं बनना चाहिए।

-लेखिका गौरी शर्मा, आध्यात्मिक चिंतक हैं

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