कई बार मुझे आश्चर्य होता है कि कुछ लोग, जो स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा के बीच पले-बढ़े हैं, आज भी उस विचारधारा से जुड़े होने का दावा करते हैं, लेकिन उसी नेतृत्व की सबसे अधिक आलोचना करते हैं जिसने उन विचारों को व्यवहार में उतारकर दिखाया।
भारतीय राजनीति में पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी दल ने पूर्ण बहुमत प्राप्त किया, लगातार तीन बार केंद्र की सत्ता में लौटा और देश को ऐसा नेतृत्व दिया जिसने एक दशक से अधिक समय तक स्थिर सरकार चलाई। भाजपा का विस्तार उत्तर, पश्चिम और पूर्व भारत से आगे बढ़कर दक्षिण भारत तक पहुंचा। कर्नाटक में सरकार बनी और तेलंगाना में भी पार्टी लगातार अपनी उपस्थिति मजबूत कर रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत की वैश्विक पहचान और प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आर्थिक क्षेत्र में चुनौतियाँ अवश्य हैं और सब कुछ आदर्श नहीं कहा जा सकता, लेकिन देश जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, वह सकारात्मक दिखाई देती है। प्रतिदिन नए सुधार, नई पहल और नई सोच के साथ काम होता दिखाई देता है।
आज भारत का बुनियादी ढांचा एक नए रूप में सामने आया है। नए संसद भवन से लेकर वाणिज्य भवन और कर्तव्य भवन तक, देश की प्रशासनिक और लोकतांत्रिक संस्थाओं को आधुनिक स्वरूप मिला है। एक्सप्रेस-वे, राष्ट्रीय राजमार्ग, आधुनिक रेलवे स्टेशन, वंदे भारत ट्रेनें और माल परिवहन की नई व्यवस्थाएँ विकास की गति को दर्शाती हैं। ऊर्जा और बिजली के क्षेत्र में भारत आज पहले की तुलना में कहीं अधिक आत्मविश्वासी और सक्षम दिखाई देता है।
धार्मिक और सांस्कृतिक पर्यटन को भी अभूतपूर्व महत्व मिला है। काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, अयोध्या में श्रीराम मंदिर और अब मथुरा-वृंदावन के विकास पर विशेष ध्यान, भारत की सांस्कृतिक चेतना को नई ऊर्जा प्रदान कर रहे हैं।
रक्षा उत्पादन और इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण में आत्मनिर्भरता की दिशा में ठोस कदम उठे हैं। स्मार्ट सिटी, सैटेलाइट टाउन, डिजिटल इंडिया, ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क और ग्रामीण क्षेत्रों
इंटरनेट की पहुंच ने शहरी और ग्रामीण भारत के बीच की दूरी कम की है।
संघ की विचारधारा से जुड़े अनेक मुद्दों पर भी ऐतिहासिक निर्णय लिए गए। अनुच्छेद 370 का हटना, जम्मू-कश्मीर में अपेक्षाकृत शांति की स्थापना और राष्ट्रीय एकता से जुड़े कई विषयों पर निर्णायक कदम उठाए गए। यह स्वीकार करना होगा कि ऐसे निर्णय लेने का साहस हर नेतृत्व में नहीं होता।
आलोचना लोकतंत्र का अनिवार्य हिस्सा है और होनी भी चाहिए। लेकिन आलोचना तभी सार्थक होती है जब वह तथ्यों और परिणामों के निष्पक्ष मूल्यांकन पर आधारित हो। यदि किसी नेतृत्व के कार्यों से देश में परिवर्तन दिखाई दे रहा है, तो केवल विरोध के लिए विरोध करना उचित नहीं कहा जा सकता।
कभी-कभी ऐसा लगता है कि जब व्यक्ति किसी विचार, संस्था या नेतृत्व पर विश्वास खो देता है, तब उसे उपलब्धियाँ भी दिखाई देना बंद हो जाती हैं। जबकि राष्ट्र निर्माण का सही दृष्टिकोण यही है कि हम मतभेदों के बावजूद उपलब्धियों को स्वीकार करें और कमियों पर रचनात्मक सुझाव दें। लोकतंत्र में असहमति का सम्मान होना चाहिए, लेकिन उपलब्धियों का सम्मान भी उतना ही आवश्यक है।
– पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक




































