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राम मंदिर प्रकरण और हमारी आस्था

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-पूरन डावर, चिंतक एवं विश्लेषक

चोरी और भ्रष्टाचार देश की नियति बन चुके है कुछ इलाज हुए हैं कुछ हो रहे हैं कुछ होंगे ऐसे प्रकरण बड़े समाधान निकालने के लिए होते है राम मंदिर ही नहीं अनेक मंदिर भ्रष्टाचार का साधन बने हुए हैं अच्छाई और बुराई एक ही सिक्के के दो पहलू है कलयुग में सुर और असुर एक ही शरीर में रहते है और ब्रह्म भी मनुष्य में ही है और सारा जीवन यही समझने की प्रक्रिया मात्र है। हमारे विचार कभी सुरीय प्रवत्ति यानी सकारात्मक और कभी असुरीय यानि नकारात्मक होते है यहीं प्रक्रिया ही जीवन है जब तक हम सुर से सुर मिलाने में सक्षम नहीं हो जाते यानी जब तक सही को सही समझने की शक्ति नहीं आ जाती या हम विकसित नहीं हो जाते या सत्य की खोज नहीं कर लेते. सनातन में मंदिर हमारी आस्था का केंद्र है हम श्रद्धा से भक्ति भाव से कुछ अर्पण करते है उसका उपयोग कैसे होता है कौन करता है कैसे करता है यह सब ईश्वरीय व्यवस्थाएं है हमारा हमारे कर्म पर अधिकार है बाकी व्यवस्था उस पर छोड़ें समय आता है चोरी पकड़ी जाती है हल निकलते हैं। कुछ प्रकरणों की तह तक जाना आम आदमी के वश में नहीं होता और न ही जाना चाहिए यह व्यवस्था जिसके पास है उसे ही हल करना है। इस समय आम जनता को अपने आस्था और कर्म पर विश्वास करना है हम अपनी आस्था से विमुख नहीं हो सकते।

राम मंदिर सनातन आस्था का केंद्र है इसकी व्यवस्था वेटिकन सिटी की तरह स्वायत्त शासी देश के रूप में होनी चाहिए, लंका जीतने के बाद यानि असुरीय प्रगतियों से निजात पाने के बाद राम राज्य का एक उदाहरण इस धरा पर हो, गीता स्मरण रहे जो हुआ सो अच्छा हुआ जो, हो रहा है सो अच्छा हो रहा है, जो होगा सो अच्छा होगा।