यह स्वीकार करना होगा कि फिलहाल चुनावी मैदान में भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देना आसान नहीं है। मोदी सरकार ने अपने काम, निर्णयों और राजनीतिक संदेश के माध्यम से एक बड़ी लकीर खींच दी है। लेकिन कोई भी सरकार स्थायी नहीं होती। हर सरकार से गलतियाँ होती हैं और समय के साथ जनता की अपेक्षाएँ भी बढ़ती हैं। लोकतंत्र में परिवर्तन स्वाभाविक है, लेकिन परिवर्तन तभी संभव होता है जब जनता के सामने एक विश्वसनीय, सक्षम और तैयार विकल्प मौजूद हो और देश के प्रति सोच हो।
सड़कों पर धींगा-मुश्ती और अराजकता पैदा करना विपक्ष की ताकत नहीं बन सकता। ऐसे तौर-तरीके जनता को अपने पक्ष में करने के बजाय उससे दूर कर देते हैं। आज जनता अपनी परेशानियाँ कम करना चाहती है, उन्हें और बढ़ाना नहीं। वह आंदोलनों और राजनीतिक तमाशों से ऊब चुकी है। कॉकरोच आंदोलन केवल टीवी चैनलों और ट्विटर पर दिखाई देने वाला शोर है, वास्तविक जनसमर्थन दूर-दूर भी नहीं है। दिल्ली सहित पूरे देश में आम जनता आंदोलनों से लगभग दूर है। दूर बैठकर लगता है दिल्ली जल रही है। मैं दिल्ली में हूँ, सब कुछ सामान्य, सड़कों पर आम चहल-पहल, बेरिकेडिंग कुछ बूढ़े रास्तों पर। कुल आबादी का एक प्रतिशत भी ऐसे प्रदर्शनों का हिस्सा नहीं बनता। इसलिए कैमरों के सामने पैदा किए गए शोर को जनभावना समझना विपक्ष की गंभीर भूल होगी।
विपक्ष के लिए एक सकारात्मक सलाह
यदि सत्ता में आना है, तो केवल सरकार का विरोध करना पर्याप्त नहीं होगा। विपक्ष को विरोधी नहीं, विकल्प बनना होगा। उसे जनता को यह विश्वास दिलाना होगा कि उसके पास सरकार चलाने की स्पष्ट दृष्टि, सक्षम टीम और ठोस कार्ययोजना मौजूद है।
विपक्ष के पास अच्छे अर्थशास्त्री हैं, तो उन्हें शैडो वित्त मंत्री की जिम्मेदारी दीजिए। सक्षम उद्योग और व्यापार विशेषज्ञ हैं, तो उन्हें शैडो वाणिज्य मंत्री बनाइए। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, रोजगार, विदेश नीति, रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे क्षेत्रों के विशेषज्ञों को साथ लेकर एक प्रभावी शैडो कैबिनेट तैयार कीजिए। जनता को बताइए कि आपकी टीम देश की अर्थव्यवस्था को कैसे गति देगी, रोजगार कैसे बढ़ाएगी, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था में क्या सुधार करेगी तथा राष्ट्रीय सुरक्षा और विदेश नीति को किस दिशा में ले जाएगी।
सरकार कोई विधेयक लाए, तो केवल उसका विरोध करने के बजाय उसके सामने एक बेहतर, व्यावहारिक और वैकल्पिक विधेयक रखिए। सदन में नारेबाजी और व्यवधान के बजाय तथ्यों, तर्कों और आंकड़ों के साथ बहस कीजिए। संभव है कि सरकार आपके कुछ अच्छे सुझाव स्वीकार करे और यदि वह ऐसा न भी करे, तो जनता के सामने यह स्पष्ट होगा कि किस पक्ष के पास बेहतर विचार और देश की जनता का भला हो, यही अधिक जिम्मेदार समाधान हैं। लोकतंत्र में यही स्वस्थ प्रतिस्पर्धा जनता को वास्तविक विकल्प देती है।
विरोध लोकतंत्र का आवश्यक हिस्सा है, लेकिन विरोध का उद्देश्य संस्थाओं को कमजोर करना नहीं, बल्कि उन्हें अधिक जवाबदेह और मजबूत बनाना होना चाहिए। चुनाव आयोग हो, प्रवर्तन निदेशालय हो या सीबीआई—उनके कामकाज पर सवाल उठाना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन सवाल प्रमाणों, तथ्यों और सुधार के ठोस प्रस्तावों के साथ उठाए जाने चाहिए। हर चुनावी हार का दोष केवल संस्थाओं के सिर मढ़ देने से जनता का भरोसा नहीं जीता जा सकता। चुनाव आयोग की सघन जाँच में किसी एक पार्टी विशेष का हित असंभव है। यदि मान भी लिया जाए तो सघन जाँच प्रक्रिया कुछ सीटों में अंतर ला सकती है, लेकिन व्यापक जनादेश बदलने के लिए जनता का विश्वास और समर्थन ही निर्णायक होता है।
संवैधानिक ढाँचे को कमजोर करना किसी भी राजनीतिक दल के हित में नहीं है। लोकतंत्र ही वह रास्ता है जिसके माध्यम से विपक्ष देर-सवेर सत्ता में लौट सकता है। इसलिए उस रास्ते को अराजकता, अविश्वास और संस्थाओं के प्रति निरंतर संदेह से ध्वस्त नहीं करना विपक्ष के लिए ही अधिक घातक है। यदि किसी तरह अराजकता और अव्यवस्था के बीच सरकार बदल भी जाए, तो ऐसी सरकार के लिए स्थिर रहना, निर्णय लेना और जनता का भरोसा बनाए रखना कठिन होगा।
विपक्ष को यह समझना होगा कि सत्ता केवल सरकार की कमियों को गिनाने से नहीं मिलती। सत्ता उस दल को मिलती है जो जनता की समस्याओं को समझता है, उनके समाधान का भरोसा देता है और उन्हें लागू करने की क्षमता भी दिखाता है। केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि वर्तमान सरकार गलत है; यह भी बताना होगा कि आपकी सरकार क्या बेहतर करेगी और कैसे करेगी।
देश को अराजकता फैलाने वाला विपक्ष नहीं, बल्कि तैयारी के साथ सामने आने वाला सक्षम विकल्प चाहिए। विपक्ष अपनी योग्यता, विचारों, नीतियों और वैकल्पिक टीम के माध्यम से जनता का विश्वास जीते। सत्ता परिवर्तन का स्थायी, सम्मानजनक और लोकतांत्रिक रास्ता यही है।




































