आगरा। रंगमंच का पर्दा गिरने के बाद भी कुछ कलाकार अपनी आवाज, अभिनय और रचनात्मक दृष्टि से दर्शकों की स्मृतियों में जीवित रहते हैं। वरिष्ठ रंगकर्मी, नाट्य निर्देशक, कुशल मंच संचालक और अधिवक्ता विनय पतसरिया ऐसी ही शख्सियत थे। उनकी तीसरी पुण्यतिथि, 17 अक्टूबर 2026, पर आगरा के रंगमंच में उनके योगदान और समृद्ध कलात्मक विरासत का स्मरण स्वाभाविक है। 17 अक्टूबर 2023 को उनका निधन हुआ था।
विनय पतसरिया के लिए रंगमंच केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं था। उनकी प्रस्तुतियाँ दर्शकों को सामाजिक विषयों और मानवीय संवेदनाओं पर सोचने के लिए प्रेरित करती थीं। कड़ा अनुशासन, कलाकारों का सटीक चयन और प्रस्तुति की बारीकियों पर ध्यान उनके निर्देशन की विशेषताएँ थीं। उनके नाटकों के शो हाउसफुल रहते थे। जीवन के अंतिम दौर में प्रस्तुत नाटक ‘गधे की बारात’ भी उनकी यादगार प्रस्तुतियों में शामिल रहा।
आगरा में जन्म, यहीं शिक्षा और कर्मभूमि
विनय पतसरिया का जन्म 5 जुलाई 1960 को आगरा के पुनियापाड़ा मोहल्ले में चैतन्य स्वरूप शर्मा और शांति शर्मा के मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था। उनका पैतृक गांव मथुरा का शेरगढ़ था, लेकिन आगरा ही उनकी जन्मभूमि और कर्मभूमि रहा। परिवार में उनके भाई विष्णु स्वरूप शर्मा, विनोद भारद्वाज और विपिन बिहारी शर्मा तथा बहनें ऊषा शर्मा और मंजू शर्मा रहीं। उनकी पत्नी डॉ. रेखा पतसरिया आगरा कॉलेज की प्राचार्य रही हैं। परिवार में उनकी दो बेटियां भी हैं।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा राजकीय आदर्श विद्यालय और माध्यमिक शिक्षा राजकीय इंटर कॉलेज से प्राप्त की। इसके बाद आगरा कॉलेज से बीए और एलएलबी की पढ़ाई पूरी की।
कॉलेज से मिली वाक्पटुता को पहचान
आगरा कॉलेज में अध्ययन के दौरान वह छात्र राजनीति के साथ साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय रहे। वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में कॉलेज से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक अपनी प्रतिभा का परिचय दिया और पुरस्कार प्राप्त किए। उनकी यही वाक्पटुता आगे चलकर प्रभावशाली मंच संचालन का आधार बनी।
कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने कलेक्ट्रेट में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी के मार्गदर्शन में वकालत शुरू की। बाद में वह दीवानी न्यायालय में प्रैक्टिस करने लगे और जीवनपर्यंत उससे जुड़े रहे। आगरा बार एसोसिएशन के सचिव के रूप में उन्होंने बार हॉल में पुस्तकालय सहित अधिवक्ताओं की सुविधाओं से जुड़े कई कार्य कराए। वह डाबर ग्रुप और शारदा ग्रुप से विधिक सलाहकार के तौर पर भी जुड़े रहे।
‘एक और द्रोणाचार्य’ से शुरू हुआ रंगमंच का सफर
विनय पतसरिया ने वर्ष 1980 में रंगमंच की यात्रा शुरू की। उनका पहला नाटक ‘एक और द्रोणाचार्य’ था, जिसका निर्देशन अनिल चौहान ने किया था। हिंदी रंगमंच के पुरोधा डॉ. राम गोपाल सिंह चौहान के मार्गदर्शन में उन्होंने अभिनय और बाद में नाट्य निर्देशन का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
उन्होंने ‘कथा एक कंस की’, ‘अंधा युग’, ‘सिंहासन खाली है’, ‘नई समस्या’, ‘लॉटरी’, ‘विषपायी’, ‘खलदेवा की जय-जयकार’ और ‘गधे की बारात’ जैसे नाटकों में अभिनय किया। सशक्त संवाद अदायगी और प्रभावशाली मंचीय उपस्थिति ने उन्हें विशिष्ट पहचान दिलाई।
अभिनय के बाद निर्देशन में भी छोड़ी छाप
अभिनय में अपनी पहचान बनाने के बाद उन्होंने नाट्य निर्देशन की ओर कदम बढ़ाया। ‘मि. अभिमन्यु’ का निर्देशन करने के बाद उन्होंने कई ऐसे नाटकों का भी निर्देशन किया, जिनमें वह पहले अभिनय कर चुके थे।
वह ध्वनि एवं प्रकाश कार्यक्रमों से भी जुड़े रहे। ‘सुलहकुल’ में अभिनय के बाद उन्होंने कई प्रस्तुतियों का निर्देशन किया। ‘जश्न-ए-आजादी’ की श्रृंखला के अंतर्गत ‘ए वतन तेरे लिए’, सूरसदन प्रेक्षागृह में ‘साध्वी चंदनबाला’ और ‘महावीर स्वामी’ तथा ताजखेमा पर ‘अकबर’ और ‘कृष्णा’ उनकी प्रमुख प्रस्तुतियों में शामिल रहे। ताज महोत्सव में भी उन्होंने सांस्कृतिक संयोजक की भूमिका निभाई।
फिल्म और दूरदर्शन तक पहुंची प्रतिभा
रंगमंच के साथ विनय पतसरिया ने फिल्म और टेलीविजन में भी काम किया। वासु भगनानी की फिल्म ‘तेरा जादू चल गया’ में उन्होंने कला निर्देशक के रूप में योगदान दिया। कृष्ण राघव के निर्देशन में दूरदर्शन के धारावाहिक ‘मछलीघर’ और शरतचंद्र के उपन्यास पर आधारित ‘शेष प्रश्न’ में कला निर्देशन तथा अभिनय किया।
मंच संचालन की प्रभावशाली आवाज
आगरा के अनेक बड़े आयोजनों में विनय पतसरिया ने अपने मंच संचालन से अमिट छाप छोड़ी। विषय की समझ, भाषा पर पकड़ और अवसर के अनुरूप प्रस्तुति उनकी विशेषता थी। उन्होंने मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और योगी आदित्यनाथ के आगरा में आयोजित कार्यक्रमों में भी मंच संचालन का दायित्व निभाया।
विनय पतसरिया की कला, अनुशासन और रचनात्मक प्रतिबद्धता नई पीढ़ी के रंगकर्मियों के लिए प्रेरणा है। जीवन के रंगमंच से विदा होने के बाद भी उनकी प्रस्तुतियाँ और प्रभावशाली आवाज आगरा की सांस्कृतिक स्मृतियों में जीवंत हैं।
लेखक डॉ. महेश धाकड़ वरिष्ठ पत्रकार हैं।




































