Home Interview काका हाथरसी ने कैसे दिया पवन ‘आगरी’ नाम? विशेष साक्षात्कार में कवि...

काका हाथरसी ने कैसे दिया पवन ‘आगरी’ नाम? विशेष साक्षात्कार में कवि ने साझा की साहित्यिक यात्रा

3
0

हिंदी हास्य-व्यंग्य साहित्य की समृद्ध परंपरा में अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त, देश-विदेश के काव्य मंचों पर अपनी विशिष्ट प्रस्तुतियों से पहचान बनाने वाले कवि पवन आगरी की साहित्यिक यात्रा गुरु-शिष्य परंपरा, रचनात्मक साधना और नई प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने की प्रेरक कहानी है। उनकी पहचान के पीछे एक बेहद दिलचस्प प्रसंग जुड़ा है। हिंदी हास्य-व्यंग्य के शिखर पुरुष काका हाथरसी ने ही वर्ष 1991 में पवन अग्रवाल को पवन ‘आगरी’ नाम दिया था। काका जी से मिला यह साहित्यिक उपनाम आगे चलकर उनकी वैश्विक पहचान का आधार बना। काका हाथरसी से प्राप्त तुकांत कोश, उनके साथ पत्राचार और मंच साझा करने के अनुभव आज भी पवन आगरी की स्मृतियों में जीवंत हैं। टीबीआई 9 से विशेष बातचीत में पवन आगरी ने अपने साहित्यिक जीवन के अनेक अनछुए पहलुओं को साझा किया।

आपका मूल नाम पवन अग्रवाल था। फिर आप पवन ‘आगरी’ कैसे बने? इस नामकरण में काका हाथरसी जी की क्या भूमिका रही?
यह मेरे जीवन की अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। वर्ष 1991 में मैं काका हाथरसी जी से मिलने उनके निवास पर गया था। उन दिनों मैं छोटी-छोटी रचनाएँ पवन अग्रवाल के नाम से लिखता था। काका जी ने मेरी कुछ कविताएँ सुनीं और मुझे आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा कि यदि साहित्य की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनानी है, तो कोई विशिष्ट उपनाम रखना चाहिए। पवन अग्रवाल नाम के हजारों लोग होंगे। मैंने उनसे निवेदन किया कि काका जी, आप ही मेरा कोई उपनाम रख दीजिए। तब उन्होंने कहा, “मैं हाथरस से हूँ, इसलिए हाथरसी लिखता हूँ। तुम आगरा से हो, इसलिए अपने नाम के साथ आगरी लगा लो।”

काका हाथरसी जी से पहली मुलाकात में आपको नाम के अतिरिक्त क्या मार्गदर्शन मिला?
काका जी से मिलने का मेरा उद्देश्य ही उनका मार्गदर्शन प्राप्त करना था। मैं उन्हें बहुत सुनता था और उनकी लोकप्रियता तथा साहित्यिक प्रतिभा से प्रभावित था। उन्होंने मेरी कविताएँ सुनीं और मुझे अपनी एक पुस्तक भेंट की। वह एक प्रकार की तुकांत कोश थी, जिसमें अनेक शब्दों के तुकांत दिए गए थे। उस पुस्तक से मुझे बहुत सहायता मिली। मैंने शब्दों के नए प्रयोग सीखे और अपनी रचनाओं में उन्हें अपनाया। मेरी कई रचनाओं में काका जी से प्राप्त इस मार्गदर्शन की छाप दिखाई देती है। काका जी से मेरा पत्राचार भी होता रहा। वर्ष 1995 में उनके निधन तक हमारा संपर्क बना रहा। उनके लिखे हुए पत्र आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। उनमें से कुछ पत्र मैंने सोशल मीडिया पर भी साझा किए हैं।

क्या आपको काका हाथरसी जी के साथ कभी किसी कवि सम्मेलन में मंच साझा करने का अवसर मिला?
जी हाँ, यह मेरे लिए बहुत गर्व की बात रही कि मुझे राजस्थान के धौलपुर में काका हाथरसी जी के साथ एक ही मंच पर काव्यपाठ करने का अवसर मिला। जिस महान कवि को सुनकर मैं प्रेरित होता था, उनके साथ मंच साझा करना मेरे जीवन की अविस्मरणीय उपलब्धियों में से एक है। मैं आज भी हर वर्ष 18 सितंबर को उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। उनका जन्म 18 सितंबर 1906 को हुआ था और निधन भी 18 सितंबर 1995 को हुआ। यह संयोग भी अपने आप में विशेष है।

आपके साहित्यिक जीवन में पहला बड़ा अवसर कब आया?
वर्ष 1995 मेरे साहित्यिक जीवन में एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा। आगरा के सूरसदन में एक बड़ा साहित्यिक आयोजन हुआ था, जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध फिल्म गीतकार और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित मजरूह सुल्तानपुरी साहब ने की थी। इस कार्यक्रम का संचालन प्रख्यात शायर वसीम बरेलवी साहब ने किया था। उस मंच पर मुझे एक युवा कवि के रूप में काव्यपाठ करने का अवसर मिला। मेरे लिए यह बहुत बड़ा अवसर था। उस आयोजन ने मुझे साहित्यिक जगत में आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिया। इस आयोजन का आमंत्रण पत्र और उस समय अमर उजाला में प्रकाशित समाचार आज भी मेरे पास सुरक्षित हैं। वे दस्तावेज मेरे साहित्यिक जीवन की महत्वपूर्ण स्मृतियाँ हैं।

आपकी चर्चित व्यंग्य रचना ‘हिंदी के पुजारी’ के पीछे क्या प्रेरणा रही?
मेरी यह रचना हिंदी भाषा और उसके सरोकारों पर केंद्रित है। आज हम देखते हैं कि लोग अंग्रेजी के शब्दों का अत्यधिक प्रयोग करते हैं और कई बार अपनी मातृभाषा तथा उसके साहित्य को भी ठीक से नहीं समझते। इसी प्रवृत्ति पर मैंने व्यंग्य करने का प्रयास किया। इस रचना में एक विद्यार्थी का प्रसंग है, जिसे हिंदी के महान कवियों की जीवनियाँ याद नहीं होतीं। वह परीक्षा में नकल करने के लिए अलग-अलग पर्चियाँ बनाकर अपने शरीर के विभिन्न हिस्सों में छिपा लेता है। इसी प्रसंग के माध्यम से हास्य उत्पन्न होता है। मैंने उसमें कबीरदास, सूरदास, तुलसीदास, बिहारीलाल, महादेवी वर्मा, सुमित्रानंदन पंत और जयशंकर प्रसाद जैसे साहित्यकारों के नामों का रोचक प्रयोग किया है। मेरी इस रचना को देश-विदेश के मंचों पर बहुत पसंद किया गया है। इसमें केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि भाषा और शिक्षा व्यवस्था से जुड़ा संदेश भी है। इस रचना की लोकप्रियता मेरे लिए विशेष संतोष का विषय है। काका हाथरसी जी से मिली तुकांत कोश और उनके मार्गदर्शन ने भी मेरे रचनात्मक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

काका हाथरसी जी के समय और आज के हास्य-व्यंग्य कवि सम्मेलनों में आपको क्या अंतर दिखाई देता है?
बहुत बड़ा अंतर आया है। आज कवि सम्मेलन काफी हद तक व्यावसायिक हो गए हैं। कॉमेडी शो के बढ़ते प्रभाव के कारण मंचों पर वनलाइनर और चुटकुलों का प्रचलन बढ़ा है। कुछ लोग चुटकुलों को ही कविता के रूप में प्रस्तुत करने लगे हैं। काका हाथरसी जी कुंडलियाँ लिखते थे। उनकी रचनाओं में छंद, भाषा, लय और साहित्यिक अनुशासन होता था। आज उस प्रकार के छंदबद्ध हास्य-व्यंग्य लेखन में कमी दिखाई देती है।
मेरा मानना है कि हास्य साहित्य की अपनी गरिमा होनी चाहिए। हास्य और व्यंग्य केवल हँसाने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की विसंगतियों पर सार्थक टिप्पणी करने की विधा भी है।

क्या आपको लगता है कि हिंदी साहित्य ने आपको आपकी अपेक्षाओं के अनुरूप पहचान और सम्मान दिया?
बिल्कुल। हिंदी साहित्य और हास्य-व्यंग्य की परंपरा से मुझे जितनी अपेक्षाएँ थीं, उससे मुझे भरपूर मिला है। मैं अपनी साहित्यिक यात्रा से बहुत संतुष्ट हूँ। देश-विदेश में मुझे अनेक मंचों पर काव्यपाठ करने के अवसर मिले और अनेक सम्मान प्राप्त हुए। आज मैं जो कुछ भी हूँ, उसमें मेरे गुरु काका हाथरसी जी का बहुत बड़ा योगदान है। उनसे मिला मार्गदर्शन मेरे साहित्यिक जीवन की अमूल्य पूँजी है।

आपने नई पीढ़ी के कवियों को आगे बढ़ाने के लिए क्या प्रयास किए हैं?
मेरा हमेशा प्रयास रहता है कि प्रतिभाशाली युवा रचनाकारों को बड़े मंचों पर अवसर मिले। इसी उद्देश्य से मैंने जीडी गोयनका समूह के सहयोग से आगरा में ताज साहित्य उत्सव की शुरुआत की। इस आयोजन में देशभर के नए और प्रतिभाशाली रचनाकारों को आमंत्रित किया जाता है, ताकि वे अपनी रचनाएँ बड़े मंच पर प्रस्तुत कर सकें। मेरा मानना है कि प्रतिभा को पहचानना और उसे अवसर देना बहुत आवश्यक है। काका हाथरसी जी ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी थी। उसी परंपरा को आगे बढ़ाना मैं अपना दायित्व मानता हूँ।

क्या आप किसी ऐसे युवा रचनाकार का उदाहरण देना चाहेंगे, जिसे आपके प्रयासों से आगे बढ़ने का अवसर मिला?
ऐसे कई उदाहरण हैं। बुलंदशहर के युवा रचनाकार अमित कुमार यश को मैंने पहली बार गाजियाबाद के एक आयोजन में सुना था। उनकी रचनाएँ मुझे पसंद आईं और मैंने उन्हें एक बड़े मंच पर आमंत्रित किया। वहाँ लखनऊ दूरदर्शन के एक कार्यक्रम अधिकारी भी उपस्थित थे। उन्होंने अमित की बेटियों पर केंद्रित एक रचना सुनी और उसके बाद अमित को लखनऊ दूरदर्शन में प्रस्तुति का अवसर मिला। बाद में मैंने उन्हें दिल्ली टेक्नोलॉजिकल यूनिवर्सिटी के एक आयोजन में भी इस कार्यक्रम की संयोजिका सरिता जैन से आमंत्रित करवाया। इसी प्रकार आगरा के युवा शायर दीपांशु शर्मा ‘ शम्स’ से मेरी मुलाकात हुई। वह चाट की ठेल लगाते थे। एक दिन उन्होंने मुझे पहचानकर मेरे पैर छुए और बताया कि वह शायरी लिखते हैं। जब मैंने उनके कुछ शेर सुने, तो उनकी प्रतिभा से प्रभावित हुआ। इसके बाद मैंने उन्हें अपने कई कार्यक्रमों में मंच दिया और अभिनेता राजपाल यादव के हाथों उनका सम्मान भी करवाया।

आपके साहित्यिक जीवन की कोई ऐसी इच्छा, जो आज भी अधूरी है?
देश-विदेश में मुझे अनेक पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हुए हैं। लेकिन मेरी एक विशेष इच्छा आज भी है। मैं चाहता हूँ कि मुझे कभी काका हाथरसी सम्मान प्राप्त हो। उनके परिवार और संबंधित समिति द्वारा यह सम्मान प्रदान किया जाता है।

यदि आज काका हाथरसी जी आपके सामने होते, तो आप उनसे क्या कहते?
यदि काका जी आज होते, तो निश्चित रूप से मेरी साहित्यिक यात्रा देखकर प्रसन्न होते। वह स्वयं युवा प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने का प्रयास करते थे। उन्होंने मेरे लिए भी यही किया। मैंने उनके निधन के बाद उन पर एक लेख लिखा था। उसमें मैंने अपनी भावनाएँ बहुत कम शब्दों में व्यक्त की थीं। “मेरी प्रसिद्धि के तुम ही कारण थे, काका।”
मेरे लिए यही शब्द सब कुछ कह देते हैं।